Monday, 22 July 2013

इस रात की सुबह नहीं

छोटी थी मैं,
बरसात में खेलती दिखती हूँ।।
फिर माँ की डांट के साथ,
गरम चाय की चुस्कियाँ लेती दिखती हूँ।।
दोस्तों, सहेलियों के साथ स्कूल में पढ़ती,
फिर उन्ही को छोड़ती भी दिखती हूँ।।

बचपन बीता, अब मैं कुछ बड़ी हुई,
उस बड़प्पन में भाई-बहन को समझती हूँ।।
पर कुछ नादानी मैंने की थी,
और पापा  डांट खाती हूँ।।
ज़िनदगी के उस मोड़ पर,
गिरती-संभालती दिखती हूँ।।

फिर वो दिन आए,
जिसका हर लड़की ख्वाब देखती है,
प्यार के वो पल जिनमे मैं रोटी भी और हस्ती हु।
कभी मैं टूटी कभी संभाला खुद को,
कभी दुनिया में सबसे खुश-किस्मत मन खुद को।
आज उन्ही रहो,
उन्ही गलियों से गुज़रती दिखती हु।

वो हर ख़ुशी-दुःख का पल याद अत है,
अपनी नन्ही पारी का वो पहला स्पर्श याद अत है।
फिर उसकी ज़िन्दगी के वो पल जिनसे मैं गुजरी थी,
उसे भी वही जीता देखती हु।

आज सब यहीं हैं,
मेरे दोस्त, मेरा परिवार।
पर कुछ नहीं दीखता।
दीखता है तो वो हर क्षण,
जो मैंने आज तक जिया।
आँखों के सामने सभी लम्हे मौजूद हैं,
कोई त्यौहार, जश्न या कलह ही सही।
पर अब आँखें मूंदते हुए ये आभास है,
की मेरी इस रात की सुबह नहीं।।

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