समाज के प्रश्नों कि,
शरशय्या पर जो लेटी है।
लक्ष्मी का वो रूप,
पत्नी, माँ और बेटी है।
फसी हुई इस चक्रव्यूह में,
पल-पल मर कर जीती है।
तिल-तिलकर जलती रहे,
क्या यही समाज की रीति है?
हर युग में क्यों जलकर,
वही परीक्षा देती है?
देवी का वह रूप,
क्यों आँखों में चुभती रहती है?
नर-नारी के इस अंतर को,
आज हमें मिटाना है।
यह वो कड़वा सच है,
जो अब हमें झुठलाना है।
शरशय्या पर जो लेटी है।
लक्ष्मी का वो रूप,
पत्नी, माँ और बेटी है।
फसी हुई इस चक्रव्यूह में,
पल-पल मर कर जीती है।
तिल-तिलकर जलती रहे,
क्या यही समाज की रीति है?
हर युग में क्यों जलकर,
वही परीक्षा देती है?
देवी का वह रूप,
क्यों आँखों में चुभती रहती है?
नर-नारी के इस अंतर को,
आज हमें मिटाना है।
यह वो कड़वा सच है,
जो अब हमें झुठलाना है।